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22 Oct 2018

Baxar Top News: विद्या होने के बाद भी विद्वान नहीं था रावण- आचार्य रत्नेश जी महाराज ।

उन्होंने कहा कि जब खलनायक को नायक जैसी या उससे भी अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाए, तब लोगों के मन में खलनायक बनने की वृत्ति का उदय होना स्वाभाविक है

- कहा, स्वादिष्ट भोजन की तरह लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है बुराई व पाप.

- समाज में अच्छे लोगों का चित्रण किया जाना आवश्यक.


बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर: रावण दुर्गणों का पुंज तथा बुराई का प्रतीक है. बुराई का चित्रण समाज के लिए घातक है. उक्त बातें महायज्ञ में अयोध्या से पधारे कथा भास्कर आचार्य रत्नेश जी महाराज ने रामायण की कथा के दौरान रविवार को कही. उन्होंने कहा कि कुछ ग्रंथों में रावण के व्यक्तित्व के विराट रूप देखने को मिलता है. किंतु श्री राम चरित्र मानस का रावण हीन और खलनायक है. महाराज जी ने कहा कि बुराई का ऐसा चित्रण जो लोगों के अंत:करण पर ऐसी छाप छोड़े की एक बार बुरा बनने के लिए मन उछल उठे. समाज के लिए कल्याणकारी नहीं हो सकता.
विद्या होने के बावजूद रावण विद्वान नही था: महाराज जी ने कहा कि रावण के पास विद्या होने के बावजूद भी वह विद्वान नहीं था. ज्ञान था, पर ज्ञानी नहीं था. लोगों पर शासन करता था, पर अनुशासित नहीं था. उन्होंने कहा कि केवल शब्द का ज्ञान नहीं होना चाहिए. वह ज्ञान आचरण में भी होना चाहिए. उन्होंने कहा कि कुछ लोग रावण को स्वयं का पूर्वज बता रहे हैं. अगर किसी के खून में किसी का पूर्वज शराबी हो व्यसनी हो व्यभिचारी हो तो क्या वह आदर्श कहा आएगा? उन्होने कहा कि वाल्मीकि रामायण में रावण स्वयं श्री जानकी जी से कहता है कि हम राक्षसों का धर्म है पर स्त्री हरण व गमन करना और मैं इस धर्म का पालन कर रहा हूं. दूसरी बात सीता हरण के पूर्व भी रावण न जाने कितनी स्त्रियों का अपहरण कर चुका था. मां जानकी को स्पर्श करने की हिम्मत रावण को इसलिए नहीं हुई थी उसे पूंजीकस्थला नाम की अप्सरा का श्राप था कि किसी भी स्त्री के साथ यदि जबरदस्ती करने की कोशिश करोगे तो सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे. रावन किसी अच्छाई के कारण मां जानकी से दूर रहा, ऐसा नहीं था. वह भय के कारण जानकी से दूर रहा.

चित्रण अच्छे लोगों का करना चाहिए: महाराज जी ने कहा कि अगर चित्रण करना है तो अच्छे लोगों की करें. इस समय बुराई और पाप को भी स्वादिष्ट व्यंजन की तरह लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है. जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. यह राष्ट्र व समाज के लिए घातक है. उन्होंने कहा कि जब खलनायक को नायक जैसी या उससे भी अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाए, तब लोगों के मन में खलनायक बनने की वृत्ति का उदय होना स्वाभाविक है.





















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